June 7, 2020
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‘An Insignificant Man’ – कल तक एक सवाल था, आज के तर्कसंगत जवाब है!

  • by Team TSD
  • February 16, 2020

‘आम आदमी पार्टी (आप)’, आज जब मैं इस आर्टिकल को लिख रहा है, पूरा देश ही नहीं दुनिया अच्छे से इस नाम को जानती भी है और पहचानती भी।

2016 में अरविंद केजरीवाल के शुरू हो चुके नए सफ़र पर या कहें तो आम आदमी पार्टी के बनने के सफ़र को लेकर फ़िल्म आई, An Insignificant Man.

शायद फ़िल्म कहना इसके लिए एक मुनासिब सा शब्द न हो। क्यूंकि इसमें ना तो कोई नाटकीय रूपांतरण था, ना ही कोई नायक। बस ऐसा लगता है जैसे किसी को पता था कि एक दिन लोग इस पार्टी और इसके नेताओं के बारे में सुनने, देखने और जानने के लिए बेक़रार होंगें, लोग इतिहास कुरेदना चाहेंगें और इसलिए उन पलों के सामने कैमरा रख दिया गया।

दरसल वाकई में कुछ ऐसा ही हुआ, इस फ़िल्म के डायरेक्टर्स, खुशबू रांका और विनय शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों से मदद माँगते हुए उन्हें कैमरा और साउंड का प्रशिक्षण दिया और बस जो कुछ भी इस पूरी टीम ने कैद किया, वो हमारे सामने ही है।

खास यह था की इस फ़िल्म को फिल्माने वाले हाथ भी करीब करीब 20 से 22 साल के युवाओं के ही थे, जिनमें इस सफ़र को देखते हुए जोश तो था, लेकिन बदलाव का, उस बदलाव का जिसको वो शायद पूरे देश के साथ ही साथ अपने घर मोहल्लों और अपनों की सोच में भी देखना चाहतें थे।

और इत्तेफ़ाक देखिये, जिस उम्र में बदलाव की ये भूख बहुत तेज हो जाती है, उसी उम्र में उन्हें छोटे ही सही लेकिन इस बदलाव के वास्तविक स्वरुप को देखने, उसके गवाह बनने के साथ ही साथ इसको कैमरे में कैद करने का भी मौका मिल गया।

इस टीम में 50% से अधिक लडकियाँ थी, जिन्होंने इसको फिल्माया। वैसे तब इस पूरी टीम ने ने कैमरे में क्या कैद, आज लगभग हर कोई देख ही चुका होगा।

और आज एक बार और इस फ़िल्म को देखिएगा। हालत बदल गये हैं, या इस कहें तो बेहतर हुए हैं (इस फ़िल्म के सन्दर्भ में)! आज अरविंद केजरीवाल तीसरी बार देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और जनता का उनपर भरोसा आज भी बरक़रार है। लेकिन ‘भरोसा’ बहुत पॉलिटिकल सा शब्द लगता है, आम आदमी पार्टी के लिए ‘उम्मीद’ शब्द का इस्तेमाल मुझे व्यक्तिगत तौर पर ज्यादा उचित लगता है।

दरसल आज केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को लोग उसके किये गये कामों को लेकर जितना पसंद करते हैं, उससे कहीं ज्यादा उनके विज़न को लेकर, जो राजनीति में तर्कसंगत रूप से कम ही नज़र आता है।

हालाँकि 2016 में आई इस फ़िल्म के बाद आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के शुरुआती साथियों के समीकरण भी काफ़ी बदलते रहे।लेकिन इनमें से कई ने अलग होते हुए भी एक सकारात्मक वैचारिक मतभेद का उदाहरण पेश किया। खैर! मैं यहाँ केजरीवाल को किसी नायक के तौर पर पेश नहीं करना चाहता। लेकिन इतना जरुर है, जितने भी हाथों ने इस फ़िल्म को शूट किया था, आज आप उनसे पूछेंगें तो वो भी इस बात से सहमत होंगें कि शूट के दौरान जिन जिन उम्मीदों को वो सँजोते जा रहे थे, वो बेईमानी साबित नहीं हुई!

आप भी देखिये; लेकिन एक वरिष्ठ पत्रकार की उन लाइनों को भी याद रखियेगा कि “किसी भी राजनेता या पार्टी के फैन मत बनिए, वरना आप उनसे सवाल पूछने का हक़ खो देंगें!”

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