सफ़र दिल्ली के “खान मार्केट” का जो शायद बन सकता है ‘नाम बदलने की प्रथा’ का अगला शिकार?

  • by Staff@ TSD Network
  • May 17, 2019

आपको शायद सुनकर थोडा अजीब लगे लेकिन 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब उसके चलते लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा। और तब देश में रिफ्यूजी कॉलोनियों ने ऐसे लोगों के जीवन के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी। और ऐसी ही एक रिफ्यूजी कॉलोनी थी आज का ‘खान मार्केट’, जो आज एशिया के सबसे महँगें बाज़ारों में से एक है।   

उस समय के. सी. नेओजी की अध्यक्षता वाले राहत और पुनर्वास मंत्रालय ने मध्य दिल्ली के विस्तार के चलते आसपास के उभरते इलाकों जैसे निज़ामुद्दीन, जंगपुरा और लोधी कॉलोनी के साथ ही साथ खान मार्केट को भी बसाने की पहल की। यह जगह मुख्यतः विभाजन के चलते विस्थापित हुए लोगों के लिए थी। यह शरणार्थी उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) से विस्थापित हुए थे।

इस जगह का नाम लोकप्रिय NWFP लीडर और पश्तून इंडिपेंडेंस एक्टिविस्ट खान अब्दुल गफ्फार खान या फ्रंटियर गांधी के बड़े भाई, खान अब्दुल जब्बार खान के नाम पर रखा गया था।

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वैसे देखा जाए तो इस बाजार की सफलता का श्रेय कहीं न कहीं इसकी भौगोलिक स्थिति को भी दिया जाना चाहिए। सरकारी आवासों जैसे काका नगर, रवीन्द्र नगर और इसके आसपास के इलाक़े लोधी एस्टेट और अनेकों दूतावासों से घिरे चाणक्यपुरी जैसे इलाकों ने भी इस बाज़ार को पूरा समर्थन दिया है।

पहले अक्सर लोग इस बाज़ार को ‘अंग्रेजों का बाजार’ कहकर भी बुलाते थे। लेकिन बीते कुछ सालों में यह स्थिति बदली है। आज, खान मार्केट में अनेकों शानदार रेस्तरां, बार, बेकरी शॉप, बड़े कपडें के ब्रांडेड आउटलेट और कई मशहूर बुक स्टोर्स मौजूद हैं। इसकी रूप रेखा को बदलने में इन सभी का बराबर का योगदान दिखाई पड़ता है। 

यह बाज़ार भले ही महँगा जरुर हो, लेकिन खुद पर इतराते नज़र बिल्कुल नहीं आता। यहाँ आलीशान बार के साथ ही साथ पान की गुमटियों में भी सामान ही भीड़ नज़र आती है। और गलियाँ ऐसी जैसे हर गली कोई न कोई कहानी समेटे हों।

लेकिन हाल के दिनों में यह बाज़ार एक बार फ़िर से सुर्ख़ियों में हैइस बार खान मार्केट में कुछ नहीं बदल रहा, बल्कि शायद खान मार्केट ही बदल रहा है। दरसल बीजेपी यूथ विंग के एक लीडर, दीपक तनवर ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखते हुए दिल्ली के खान मार्केट का नाम बदल कर वाल्मीकि मार्केट रखने की गुजारिश की है। 

दीपक का कहना है,

नाम बदलने का विचार उन्हें पीएम मोदी के साक्षात्कार से आया, जिसमें मोदी ने कहा था कि उनकी पहचान या छवि खान मार्केट लॉबी द्वारा नहीं बनाई गई है। और अगर मोदी ख़ुद ऐसा सोचते हैं तो भला हमें यह कदम क्यूँ नहीं उठाना चाहिए?”

दरसल हम आपको बता दें कि हाल ही में एक न्यूज़ एजेंसी को दिए अपने साक्षात्कार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि

“मेरी छवि खान मार्केट या लुटियन दिल्ली लॉबी द्वारा नहीं बनाई गई है, यह मेरी 45 साल की तपस्या का परिणाम है।”

खैर! इस बीच हम आपको बता दें कि दीपक तनवर का खान मार्केट से प्रत्यक्ष रूप से कोई नाता नहीं है। अब भले ही यह कदम महज़ टीआरपी के लिए कहा जाए। लेकिन हमें सोचना चाहिए ऐसी सोच के चलते कहीं हम यह इन गलियों और दुकानवालों द्वारा सहेजी गई खान मार्केट की इतिहास रुपी विरासत को खो न दें? 

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