‘नागरिकता संशोधन कानून’ के चलते देश के मुस्लिमों में क्यों है डर का माहौल?

  • by Staff@ TSD Network
  • December 18, 2019
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देश में दिसंबर का महीना चल रहा है, और ऐसे में जब तापमान देशभर के कई हिस्सों में जमा देने वाली सर्दी पैदा कर रहा है। ऐसे में देश का राजनैतिक और सामाजिक माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है।

और कारण वही है जिसके बारे में हम सब काफी दिनों से खबरों में देख और सुन रहें हैं। जी हाँ! सरकार का लाया हुआ नागरिकता संशोधन बिल जो अब एक कानून बन चुका है।

लेकिन भला इस बिल में ऐसा क्या है कि असम से लेकर राजस्थान और उत्तर प्रदेश से लेकर मुंबई तक की सड़कों पर जनता और मुख्यतः छात्र इसका विरोध करने के लिए उतर पड़े हैं? क्या यह विरोध जायज है? या फ़िर जैसा कि सरकार कह रही है, कि महज़ विरोधी पार्टियों और कुछ लोगों की साजिश?

दरसल इतने व्यापक रूप में इस विरोध को देखते हुए अब यह कहना तो शायद सरासर झूठ ही होगा कि यह विरोध विपक्ष या कुछ लोगों की साजिश के तहत हो रहा है। लेकिन अगर यह झूठ है तो सच क्या है?

दरअसल हुआ यह कि नागरिकता संशोधन बिल को 10 दिसंबर को लोकसभा ने पारित किया गया। वहीँ राज्यसभा में यह बिल 11 दिसंबर को पारित हुआ और 12 दिसंबर को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इस बिल क़ानूनी स्वरुप मिल गया।

सबसे पहले बात असम में लोगों के विरोध की?

असल में असम में लोग इस कानून का विरोध कई वजहों से कर रहे हैं। आपको बता दें इस कानून में तीन पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हिंदू सहित छह धर्मों के उन लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जो 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ गए थे।

बात यह है कि बांग्लादेश से बड़ी संख्या में हिंदू असम में घुसपैठ करते रहे हैं। इनकी संख्या लाखों में होती है और नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद ऐसे लोगों को अब भारत का नागरिक बना दिया जाएगा।

वहीँ असम के लोग नहीं चाहते कि बांग्लादेश से कोई भी भारी संख्या में आए और देश उनको नागरिकता दे। इसके विरोध के लिए उनके पास भी तर्क हैं। दरसल असम के लोगों का मानना है कि इससे असम के लोगों की स्मिता खतरे में पड़ जाएगी। और साथ ही उन्हें यह डर है कि उनके लिए रोजगार के मौके भी घट जाएंगे।

यही नहीं, अपने कल्चर से काफ़ी प्रमुखता से लगाव रखने वाले असम के लोगों को अपनी असमी भाषा के लिए भी ख़तरा नज़र आ रहा है। वजह भी है, असल में बांग्लादेश से आए शरणार्थी अधिकांश रूप से बांग्ला बोलते हैं, और असम के लोग नहीं चाहते कि उनके क्षेत्र में बांग्ला का प्रभुत्व हो जाए और उनकी असमी भाषा लुप्त होने लग जाए।

वहीँ पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में इनर लाइन परमिट लागू है, जिसके चलते शरणार्थियों को वहां घुसने नहीं दिया जाएगा। और इसका साफ़ सा मलतब है कि असम के लोगों को यह भी डर सता रहा है कि इस इनर लाइन परमिट के चलते हिंदू शरणार्थी भारतीय नागरिक बनने के लिए असम में ही प्रवेश करेंगें।

देश के मुस्लिम वर्ग को किस बात का है डर?

देश में नागरिकता संशोधन कानून बनने के बाद से ही दिल्ली, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, लखनऊ, इलाहाबाद आदि में इसके व्यापक विरोध शरू हो गये हैं।

दरसल विरोध की मुख्य वजह यह है कि इस बिल या अब जो कानून बन चुका है उसको मुस्लिमों के खिलाफ माना जा रहा है। दरसल Citizenship Amendment Act (CAA) और National Register of Citizens (NRC) के चलते देश के मुस्लिमों को यह डर सता रहा है कि देश में आगे रहने के लिए, देश में सालों और पीढ़ियों से रह रहे मुसलमानों को भी अपने को माँगे गए कागजातों के साथ अपनी नागरिकता को साबित करना होगा।

और मुश्किल कागजातों को लेकर ही है, दरसल असम में NRC के स्वरुप को देखते हुए लोगों को डर है कि आधार, पैन इत्यादि होने के बाद भी सरकार उन्हें उनकी पहली की पीढ़ी के दस्तावेज़ों के न होने पर डिटेंशन सेंटर्स में डाल देगी। और उनसे देश की नागरिकता छीन ली जाएगी।

दरसल देखा जाये तो सरकार जहाँ एक तरफ बाहर से आए शरणार्थियों को देश की नागरिकता बाँट रही है, वहीं देश में पीढ़ियों से रह रही, वोट दे रही, आधार और पैन जैसे काग़ज रखने वाली आबादी से सरकार अपनी नागरिकता साबित करने के लिए उनके पूर्वजों का दस्तावेज मांगेंगी। और न होने पर उनसे नागरिकता छीन ली जाएगी।

और मुख्यतः इन्हीं कथित अनुमानों को लेकर अब देश में विरोध का माहौल बना हुआ है। और शायद सरकार को इसी बात की जरूरत है कि वह NRC और CAA को लेकर आगामी दिनों और साथ ही साथ मौजूदा दिनों में भी इनके प्रावधानों को लेकर जनता को सरकार द्वारा सभी माध्यमों के जरिये  प्रदान करनी चाहिए।

इस बीच हमनें जनता से भी इस विषय कर बात करने की कोशिश की और साथ ही जाना कि आखिर इन विषयों को लेकर वह क्या सोचती है। आप भी देखिये!

 

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