बीमारियों से बचने के लिए ‘हाथों को साफ़’ रखने का सुझाव देने वाले डॉक्टर को भेज दिया गया था ‘पागलखाने’

  • by Staff@ TSD Network
  • April 9, 2020
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कोरोना वायरस (COVID-19) के चलते पैदा हुए हालातों में हम सबने अच्छे से हाथ धोने की सलाह के बारे में जरुर सुना होगा। जरूरी भी है, और इसके पीछे का कारण समझना कोई रॉकेट साइंस जितना मुश्किल भी नहीं!

हमारे हाथ जगह-जगह छूटे रहते हैं, ऐसे में हाथों के जरिये संक्रमण फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है, इसलिए हाथों को अच्छे से साबुन से धोने के लिए कहा जाता है।

हिंदू, इस्लामिक, यहूदी और अन्य संस्कृतियों में धार्मिक अनुष्ठान से पहले हाथों को धोने का जिक्र तो हजारों वर्षों से होता आ रहा है। लेकिन हाथ से फैलने वाली बीमारी की धारणा मेडिकल तौर पर लगभग 130 वर्ष पहले ही प्रमाणित हुई है।

लेकिन क्या आप जानते हैं, पहली बार हाथों से बीमारी फैलने से रोकने के लिए हाथों को धोते रहने का सुझाव देने वाले डॉक्टर को दुनिया ने मानसिक रूप से बीमार घोषित कर दिया था।

जी हाँ! बात है 1846 की, जब इग्नाज फिलिप्प सेमेल्विस (Ignaz Philipp Semmelweis) नामक हंगरी के एक डॉक्टर ने वियना के एक प्रसूति (Maternity) क्लिनिक में अपनी नई नौकरी शुरू की थी। उस समय प्रसूति वार्ड में बच्चों के बुखार और रहस्यमय बीमारी के चलते जन्म देने वाली महिलाओं की मरने की संख्या तेजी से बढ़ रही थी।

कई महिलाओं का तो यह भी मानना ​​था कि डॉक्टर ही उनकी मौत का कारण बन रहें हैं और इसलिए उन्होंने इसे “डॉक्टर का प्लेग” नाम भी दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि महिलाओं ने डॉक्टरों की बजाये बच्चें के जन्म के समय दाइयों पर भरोसा जाताना शुरू कर दिया।

और इसलिए उस वक़्त वियना के अस्पताल में दो प्रसूति वार्ड बनाये गये, एक पुरुष डॉक्टरों और उनके छात्रों के लिए और दूसरा महिला दाइयों के लिए। जब डॉ. सेमेल्विस ने अस्पताल में नौकरी ज्वाइन की तो उन्होंने पाया कि पहले वार्ड में मरने वालों की संख्या, दूसरे वार्ड के मुकाबले लगभग दोगुनी थी।

तब उनके मन में इसका कारण जानने की इच्छा जगी। पर बहुत से बिंदुओं पर अपना काफी समय देने और सोचने के बाद भी वह समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसा क्यों हो रहा है?

फिर एक दिन डॉ. सेमेल्विस को बताया गया कि उनका एक सहयोगी बीमार हो गया था और बुखार के शिकार बच्चे के शव का परीक्षण (पोस्ट-मोर्टेम) करने के बाद उसकी मौत हो गयी। दरसल यही से डॉ. सेमेल्विस के दिमाग की घंटी बजी।

दरसल अस्पताल में बनाये गये दो वार्ड में सबसे बड़ा एक अंतर यह था कि डॉक्टरों वाले वार्ड में मृत महिलाओं के शव का परीक्षण (पोस्ट-मोर्टेम) किया जाता था, लेकिन दाईयों वाले वार्ड में वह ऐसा कुछ नहीं करतीं थी।

तब डॉ. सेमेल्विस तो थोड़ा बात समझ आने लगी और उन्हें समझ आया कि मृत महिलाओं के शव से सूक्ष्म कण (कीटाणु) डॉक्टरों के हाथों के जरिये अन्य स्वस्थ गर्भवती महिलाओं में स्थानांतरित हो जाते हैं, जिससे वह भी बीमारी का शिकार हो जाती हैं। और अगर इन्हीं कीटाणुओं से छुटकारा पा लिया जाए तो शायद इस संभावित बीमारी को खत्म किया जा सकता है?

इसलिए उन्होंने तुरंत ही खुद और अपने सहयोगियों को हर ऑपरेशन इत्यादि के बाद क्लोरीन-युक्त चूने के सलूशन से हाथों और मेडिकल उपकरणों को साफ़ करने के निर्देश दिए दिया। और इसका असर भी हुआ, बच्चों में बुखार के मामलों में काफी तेजी से कमी दर्ज की गयी।

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Image Source: www.cntraveller.in 

और अपने इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने कुछ सालों बाद प्रतिष्ठित वियना मेडिकल सोसाइटी में अपनी इसी हाथों की सफाई और हाथों के जरिये कीटाणुओं के फैलने की धारणा परिकल्पना पेश की। लेकिन हैरान करने वाली बात यह थी कि उनके इस सिद्धांत और सोच की कड़ी आलोचना हुई, वह भी खुद डॉक्टरों ने इसकी आलोचना की और इस धारणा को स्वीकृत नहीं दी गयी।

डॉक्टरों ने इसे खुद के ही पेशे पर हमलें के रूप में देखा, जो उनकी मौजूदा स्वच्छता प्रथाओं पर कथित हमला था। उन्होंने कहा, “भला डॉक्टर कैसे हत्यारें हो सकते हैं?” 

दरसल अस्पताल में मौतों में आई स्पष्ट कमी के बावजूद, उस वियना अस्पताल ने जल्द ही अपने पुराने तरीकों को वापस अपना लिया। और इसलिए डॉ. सेमेल्विस भी निराश होकर वापस हंगरी चले गये। वहाँ भी उन्होंने एक प्रसूति वार्ड में काम किया, और अपनी नयी धारणा को अपनाते हुए, वहां भी मृत्यु दर में कमी लायी।

लेकिन लगातार उनकी इस धारणा को खारिज कर, उनसे नाराजगी जताने वाले उनके ही साथियों की वजह से डॉ. सेमेल्विस काफ़ी निराश हो चुके थे, और कई लोग यह भी कहने लगे कि वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठें हैं। इसके बाद 1865 में उन्हें एक मानसिक अस्पताल (पागलखाने) में भर्ती कराया गया और सिर्फ 14 दिनों बाद ही वहां उनका शव मिला। कहतें हैं कथित रूप से गार्ड द्वारा बुरी तरह पीटे जाने के बाद उनकी मौत हुयी थी। वहीँ दस्तावेज कहतें हैं कि पीटने में इस्तेमाल होने वाले डंडे से फैले संक्रमण ने उनकी जान ली।

जिसके बाद आगामी कुछ वर्षों में Louis Pasteur और Joseph Lister ने जर्म थ्योरी (Germ Theory) और एंटीसेप्टिक सर्जरी (Antiseptic Surgery) जैसी अवधारणाओं को लोगों के सामने लाया। और आख़िरकार इन सब ने डॉ. सेमेल्विस के काम को मान्यता दिला कर उन्हें योगदान के लिए उन्हें सही सम्मान दिलाया।

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और देखिये आज लगभग 170 साल बाद हम उनकी इस सलाह को पहले से भी ज्यादा गंभीरता से ले रहे हैं। इससे यह साफ़ जाहिर होता है कि मानव जाति अक्सर नए सिधांतों और अवधारणाओं के प्रति उदासीन रवैया अपनाती रही है, जिसको बाद में बेशक मान्यता दी जाती है।

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