शहरी क्षेत्रों की स्वास्थ्य एवं पोषण स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों से भी ख़राब, SNEHA और Mohalla Clinics कर रहे सकारात्मक प्रयास

  • by Staff@ TSD Network
  • August 9, 2019

किसी भी देश के लिए अनियंत्रित रूप से बढ़ती जनसंख्या अपने साथ दस और समस्याओं को लेकर आती है। और यह दुखद है कि भारत की जनसंख्या बीते काफी समय से अनियंत्रित रूप से बढ़ रही है और आगे भी बढ़ते रहने का अनुमान है। 

नीति आयोग के एक लेख के मुताबिक हाल के दशकों में भारत की शहरी आबादी में काफ़ी तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है। हर साल अकेले शहरी क्षेत्रों में लगभग 77 लाख नई आबादी जुड़ रही है। 

यह समस्या भारत को हर आयामों जैसे वैश्वीकरण, आर्थिक विकास, आय असमानता, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और स्थिरता इत्यादि में चुनौती देती नज़र आ रही है। बात तेजी से बढ़ती वैश्विक अर्थव्यवस्था बनने की हो  फ़िर सीमित संसाधनों के साथ इस बढ़ती आबादी के बीच स्वास्थ्य और पोषण जैसी बुनियादी सहूलियतों को पहुँचाने की, जनसंख्या का अनियंत्रित प्रसार इन लक्ष्यों को और जटिल बनाता जा रहा है।

इस लेख में यह भी बताया गया कि NFHS IV के मुताबिक शहरी गरीब जो कुल शहरी आबादी का 26% है, के बीच पर्याप्त सेवाओं की कमी के परिणामस्वरूप स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति बदतर है। वहीँ लगभग 36% शहरी बच्चे पूर्णतः स्वास्थ्य संबंधी प्रतिरक्षा से चुक जाते हैं, इनमें शहरी गरीब बच्चों का प्रतिशन करीब 58% के बराबर है।

शहरी जनसंख्या भारत की जीडीपी में 65% का योगदान करती है जिसके 2020 तक 70-75% हो जाने की उम्मीद है वहीँ शहरी स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद प्रति व्यक्ति आय (56,347 रुपये) है, जो ग्रामीण स्तर के (30,342 रुपये) के मुकाबले लगभग दोगुना है। लेकिन अर्थव्यवस्थाओं में भारी बढ़त के बावजूद स्वास्थ्य और पोषण के पैमाने पर शहरी क्षेत्रों की स्थिति ग्रामीण क्षेत्रों से कहीं ज्यादा बदतर है। खास तौर पर शहरी गरीबों की स्थिति ग्रामीण गरीबों के मुक़ाबले कहीं अधिक ख़राब है।

शहरी आबादी, बड़े पैमाने पर गरीब और हाशिए में जीवन यापन कर रहे लोगों की यह स्थिति स्वास्थ्य वितरण प्रणाली में अपर्याप्तता, उनके कार्यस्थल जैसे निर्माण स्थलों इत्यादि, अप्रभावी आउटरीच और कमजोर रेफरल सिस्टम के कारण उत्पन्न हुई है। इसके साथ ही आर्थिक संसाधनों और स्वास्थ्य बीमा की कमी भी उपलब्ध निजी सुविधा के लिए उनकी पहुंच को बाधित करती नज़र आती है।

शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है। और इन क्षेत्रों में प्राथमिक उपचार की सेवाओं के साथ ही साथ शहरी गरीब आबादी के बीच स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की भी भारी आवश्यकता है।

हालाँकि कुछ गैर-सरकारी संगठन हैं जिन्होंने शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य एवं पोषण के पैमानों में सुधार के एकीकृत दृष्टिकोण के साथ सफलतापूर्वक कार्य कर रहें हैं। उदाहरण के लिए जैसे मुंबई आधारित एसएनईएचए (SNEHA) ने स्वयंसेवकों (वालंटियर्स) को शामिल करके मातृ और बाल पोषण मॉडल को सफलतापूर्वक चला रहा है। यह वालंटियर्स प्रति सप्ताह दो घंटे कम्युनिटी आउटरीच के लिए समर्पित करते हैं। 

इसके अलावा, दिल्ली राज्य सरकार की एक पहल, मोहल्ला क्लीनिक (प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र) भी इस दिशा में एक शानदार मॉडल है। यहाँ दवाओं, निदान और परामर्श सहित आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं का एक बुनियादी पैकेज मुफ़्त प्रदान किया जाता है। इसके अलावा भी देश के कई हिस्सों में कुछ सरकारी योजनाओं एवं गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रयास कर लोगों के बीच स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी सहूलियतों की पहुँच को सुनिश्चित किया जा रहा है। 

इस बीच इस समस्या के समाधान के लिए जरूरी है कि जटिल शहरी प्रणाली में एक बहु-आयामी दृष्टिकोण के साथ स्वास्थ्य और पोषण क्षेत्र में सुधार को एक नई एकीकृत रणनीति के साथ बल दिया जाए।

दरसल देश के विभिन्न हिस्सों में इस व्यापक समस्या के भिन्न-भिन्न कारण है, जिनकों समझने और दूर करने के लिए हम भी पुरे देश में एक ही तरीकें को लेकर नहीं चल सकतें हैं

इन प्रयासों में हर वर्ग हर जन भले फुटपाथ पर रहने वाले, कूड़ा बिनने का कार्य करने वाले, सड़क पर रहने वाले बच्चे, रिक्शा चालक, निर्माण / ईंट / चूना भट्ठा मजदूर, यौनकर्मी, और अन्य अस्थायी प्रवासियों सहित सभी कमजोर आबादी को शामिल किया जाना चाहिए।

सोर्स: Niti.gov.in

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