‘आर्टिकल 370 और 35A’ का हटना कितना सही, कितना ग़लत? – TSD Report

  • by Staff@ TSD Network
  • August 13, 2019
Article 370 & 35A

ईद बीत चुकी है और यह ईद कश्मीर के लिए कुछ ख़ास भी रही, क्यूंकि इस बार कश्मीर ने एक नई पहचान तले इस त्यौहार को मनाया। जी हाँ! आर्टिकल 370 और 35A से हटने और जम्मू-कश्मीर के एक केंद्र शासित राज्य बनने की नई पहचान।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बीते 5 अगस्त को जम्मू-कश्मीर को लेकर एक ऐतिहासिक क़दम उठाया। दरसल इस दिन सुबह सुबह ही देश के गृह मंत्री अमित शाह ने  राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को आंशिक तौर पर खत्म करने और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्र शासित राज्यों का दर्ज़ा देने संबंधी संकल्प पत्र पेश किया। और पर्याप्त संख्या बल के चलते दो ही दिन के भीतर बहस के साथ ही राज्यसभा और लोकसभा में इस बिल को पास भी कर दिया गया।

हालांकि इस बीच हम आपको बता दें कि आर्टिकल 370 के एक खंड को नहीं हटाया गया है। और इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो ऐसे केंद्र शासित राज्य बन गये हैं जिनमें से जम्मू-कश्मीर के पास अपनी विधानसभा होगी, लेकिन लद्दाख पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश रहेगा। दरसल देश में चंडीगढ़ पहले से एक ऐसा केंद्र शासित प्रदेश है जहाँ विधानसभा नहीं है।

इस विधेयक के पेश होते ही मानों सदन में हँगामा सा मच गया, राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने इसका पुरज़ोर विरोध किया। वहीँ कई लोगों ने अचानक सरकार द्वारा उठाए गये इस कदम को लेकर कहा कि सरकार जल्दबाज़ी में नज़र आ रही है। किसी ने तरीके का विरोध किया तो किसी ने इस पूरे निर्णय का ही। लेकिन विरोध में एक चीज़ का आभाव साफ़ नज़र आया और वह थे तर्क।

विपक्ष स्पष्ट नहीं कर सका कि क्यूँ कर रहा है विरोध

सरकार का यह निर्णय कितना सही है और कितना नहीं यह तो वक़्त बताएगा, लेकिन एक बात स्पष्ट दिखी कि सरकार के पास अपने इस निर्णय के बचाव के लिए पर्याप्त और उचित तर्क रहे। वहीँ विपक्ष और विरोध करने वाले लोगों ने सदन में महज़ इतिहास में हुए समझौतों की दुहाई के सिवा कुछ और नहीं बोल सके, और इस निर्णय से भविष्य में पड़ने वाले कथित नुकसान को बता पाने में विफ़ल नज़र आए।

लोकतंत्र की खूबसूरती ही होती है कि किसी भी निर्णय को लेकर पक्ष और विपक्ष में तर्कपूर्ण बहस हो और भविष्य में उसके प्रभावों को लेकर सभी आयामों को जनता के सामने स्पष्ट तौर पर पेश किया जा सके। लेकिन ऐसा लगा जैसे विरोध करने वाले दलों और नेताओं के पास भविष्य को लेकर कुछ तर्क हैं ही नहीं?

दरसल राज्यसभा में पेश हुए इस संकल्प पत्र पर उसी दिन बहस होने के चलते गुलाम नब़ी आज़ाद और कपिल सिब्बल सहित कई नेताओं ने कहा कि उन्हें तैयारी का पूरा मौका नहीं दिया गया, इसलिए इस पर बहस करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन हैरानी तब हुई जब अगले दिन लोकसभा में इस बिल को पेश करने की बारी आई। और वहां भी मुख्य विपक्ष दल कांग्रेस संख्या बल से परे अपने तर्कों और अपनी तैयारी के आधार पर भी कमजोर दिखा।

सबसे बड़ी बात यह कि इतने बड़े ऐतिहासिक बिल पर कांग्रेस के सबसे प्रमुख चेहरे राहुल गाँधी या सोनिया गाँधी किसी ने भी बोलने की कोशिश तक नहीं कि हालाँकि जिन्होंने बोला भी, उन्होंने ख़ुद पार्टी की ही तैयारी पर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए।

Article 370 & 35A tsd

वहीँ पूरी तैयारी के साथ नज़र आए अमित शाह

इस बीच देश के गृह मंत्री अमित शाह इस संकल्प पत्र को पेश करते हुए पूरी तैयारी के साथ नज़र आए। यह तैयारी न सिर्फ़ सदन में तर्कों तक सीमित रही, बल्कि इससे अलग 1 दिन पहले से ही जम्मू कश्मीर में जवानों की संख्या बढ़ाकर, बड़े स्तर पर बिना किसी भी व्यापक अफ़वाह के, शांति स्थिति को भी बनाए रखने में भी उनकी यह तैयारी नज़र आई।

दरसल शायद आपको लगे की यह लेख कहीं महज़ सरकार के क़दमों की तारीफ़ के लिए तो नहीं? तो ऐसा नहीं है, यह लेख महज़ एक विचार हैं, जो आपको सोचने पर मजबूर जरुर करेगा और सोचना भी चाहिए क्यूंकि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भी भारत का ही अविभाज्य हिस्सा हैं और वहां के भारतीय लोगों के भविष्य को लेकर भी विचार करना हमारा दायित्व हैं।

हालाँकि इस बीच एक प्रश्न जो तेजी से लोगों के बीच उठा, वह यह कि कश्मीर पर इतने बड़े फैसले को लेने से पहले क्या कश्मीरियों की राय नहीं लेनी चाहिए थी?

क्यों नहीं ली गई कश्मीरियों की राय?

एक सवाल यह भी उठा और इसका उठाना जायज भी था, लेकिन क्या आपको वाकई ऐसा लगता है कि इसका कोई तरीका था? क्यूंकि जहाँ तक एक आम कश्मीरी की बात है, तो उसको भी बाकी सभी हिन्दुस्तानियों की तरह अपने परिवार को खुश रखने, अपने बच्चों को उचित शिक्षा दिलवाने, उनके लिए भविष्य में रोजगार के सुनहरे अवसरों से ही मतलब होगा। शायद ही मैं इस पर गलत हूँ?

और इस निर्णय पर सरकार द्वारा दिए गये तर्कों से साफ़ लगता है कि वर्तमान हालातों की अपेक्षा इस नई पहचान के साथ आम कश्मीरियों के सपने जरुर पूरे हो सकेंगें। हालाँकि अगर आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरुर साझा कीजिए कि आपको ऐसा क्यों लगता है कि यह कदम वहां के आम जन-मानस के खिलाफ़ है? क्यूंकि मुझे भी विरोध का शोर सुनने से अच्छा इस विरोध के पीछे के तर्कों को सुनने में दिलचस्पी है, जो दुर्भाग्यपूर्ण रूप से हम विपक्ष द्वारा नहीं सुन पा रहे।

क्यूंकि मेरा मानना है कि अगर पहले से इस बात की जानकारी साझा कर राय लेने संबंधी प्रयास किये जाते तो जरूर ही वहां के क्षेत्रीय दल इसको लेकर लोगों के बीच हिंसा भड़काने की कोशिशें कर सकते थे, ताकि दुनिया भर में यह संदेश जाए कि कश्मीरी, भारत सरकार के फ़ैसले से खुश नहीं है और भारत के संविधान के तले पूर्णतः नहीं आना चाहते हैं।

इस बीच एक और सवाल उठता है कि अगर धारा 370 को हटाना ही था तो दो राज्य बना कर उन्हें केंद्र शासित राज्यों का दर्ज़ा क्यों दिया गया?

आखिर क्यूँ बनाये गये जम्मू-कश्मीर और लद्दाख़ दो केंद्र शासित राज्य?

इसका एक तर्क जो मुझे समझ आता है और जो अभी तक कहीं नहीं सुनने को मिला वह यह कि मान लीजिये केंद्र सरकार सिर्फ़ धारा 370 को खत्म करती और वहां के क्षेत्रीय दल जैसा की उनका इतिहास रहा है, अपने हित वाले फैसलों के न लागू होने पर हिंसा को बढ़ावा देना, कश्मीरी लोगों को भड़काने का, तो वह इस फैसले के बाद भी शायद यही कोशिशें करते?

देखिये राजनेता कहीं के भी हों वह नहीं चाहते की उनका राज्य या उनका क्षेत्र में मुख्य ताकत किसी और के पास हो? इससे उन्हें कई तरह के नुकसान होतें हैं, जैसे कि कम शक्तियों के कारण कॉर्पोरेट जगत का उनपर कम निर्भर रहना और इसके स्वरुप उन्हें कम चंदा मिलना। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण राजनैतिक वास्तविकता है जो हर दल और हर सरकार की है।

और ऐसे में अपनी शक्तियों को खोता देख, वहां के क्षेत्रीय दल उनको बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे और ऐसी संभावनाएं इसलिए भी क्यूंकि इतिहास में ऐसा कई बार देखा गया है और वैश्विक रूप से भी अशांत पड़ोसी देशों से घिरे होने के कारण भारत का वह हिस्सा हमेशा से संवेदनशील माना जाता रहा है।

मानिए महज़ धारा 370 हटा कर केंद्र सरकार वहां का शासन क्षेत्रीय दलों को पुर्णतः सौंप देती और सरकार के इस फैसले को गलत साबित करने के लिए वह दल वहां हिंसा को बढ़ावा देते, तो क्या ऐसे खतरों के बीच कभी भी कश्मीर को भारतीय संविधान के साथ जोड़ा जा सकता था?

अनुच्छेद 370 हटने पर क्या-क्या होगा बदलाव:

-जम्मू-कश्मीर अब विशेष राज्य नहीं रहेगा

-घाटी में लग सकेगा राष्ट्रपति शासन (अब तक वहां राष्ट्रपति शासन नहीं, बल्कि राज्यपाल शासन लगता था।)

-वित्तीय आपातकाल लागू होगा

-5 साल का विधानसभा का कार्यकाल (जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता था।)

– अब मिलेगा आरक्षण (कश्मीर में अल्पसंख्यकों को आरक्षण नहीं मिलता था। नए बिल के तहत जम्मू कश्मीर में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा।)

– दोहरी नागरिकता खत्म, अलग झंडा दोनों खत्म

-आरटीआई, सीएजी जैसे कानून लागू होंगे

– राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान दंडनीय होगा

– बाहरी लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन संपत्ति खरीद पाएंगे

क्या है अनुच्छेद 370 और क्यों पड़ी जरूरत: 

दरसल भारत को आजादी मिलने के बाद अगस्त 15, 1947 को जम्मू और कश्मीर भी आजाद हो गया था। इस दौरान राजा हरि सिंह वहां के शासक थे और वह अपनी रियासत को स्वतन्त्र राज्य रखना चाहते थे। लेकिन 20 अक्टूबर, 1947 को पाकिस्तान समर्थित ‘आजाद कश्मीर सेना’ ने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और काफी हिस्सा हथिया लिया था।

इसी स्थिति में राजा हरि सिंह ने जम्मू & कश्मीर की रक्षा के लिए शेख़ अब्दुल्ला की सहमति से जवाहर लाल नेहरु के साथ मिलकर 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ जम्मू & कश्मीर के अस्थायी विलय की घोषणा कर दी और “Instruments of Accession of Jammu & Kashmir to India” पर अपने हस्ताक्षर कर दिये।

इस नये समझौते के तहत जम्मू & कश्मीर ने भारत के साथ सिर्फ तीन विषयों: रक्षा, विदेशी मामले और संचार को भारत के हवाले कर दिया था।

समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत सरकार ने वादा किया कि “’इस राज्य के लोग अपने स्वयं की संविधान सभा के माध्यम से राज्य के आंतरिक संविधान का निर्माण करेंगे और जब तक राज्य की संविधान सभा शासन व्यवस्था और अधिकार क्षेत्र की सीमा का निर्धारण नहीं कर लेती हैं तब तक भारत का संविधान केवल राज्य के बारे में एक अंतरिम व्यवस्था प्रदान कर सकता है।

इस प्रतिबद्धता के साथ आर्टिकल 370 को भारत के संविधान में शामिल किया गया था. जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में ये प्रावधान केवल अस्थायी हैं। इन प्रावधानों को 17 नवंबर 1952 से लागू किया गया था।

हालाँकि आज जम्मू-कश्मीर की स्थिति क्या है वह जगजाहिर है और वहां के स्थानीय लोगों के लिए विकास और देश की मुख्यधारा से जुड़ने के साथ-साथ शांति भी एक अहम मुद्दा रहा है। आखिर कौन नहीं चाहता की कश्मीर में शांति हो और वहां के लोग भी डर के साये में जीने के बजाए अपने और अपने बच्चों के लिए सुनहरे भविष्य का सपना संजो सकें।

और ऐसी स्थिति में मेरे मत से इतेफ़ाक न रखने वालों से मैं सिर्फ़ इतना सवाल करना चाहता हूँ कि अगर उनके पास विरोध का कोई तर्क है तो मुझे बेहद ख़ुशी होगी कि वह मुझे उससे अवगत करवाएं और यदि आप हमारे विचारों से सहमत हैं तब भी कमेंट बॉक्स पर अपनी राय व्यक्त करें।

धन्यवाद!

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