प्रयागराज में करिंगा शैली में प्रस्तुत “तीन तुर में 3 रुपैया” का मंचन शानदार तरीकें से संपन्न

  • by Staff@ TSD Network
  • August 26, 2019

संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से सुविख्यात लोकनाट्य रचनाकार एवं लोकनाट्यविद श्री राजकुमार श्रीवास्तव के निर्देशन में आज दिनांक 25 अगस्त 2019 को अपराहन 4:00 बजे स्थानीय उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के प्रेक्षागृह में लोक नाटक करिंगा शैली में प्रस्तुत “तीन तुर में 3 रुपैया” का मंचन किया गया।

बीते समय में अन्य लोकनाट्यों की भांति ही लोकनाट्य करिंगा की प्रस्तुतियां उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेहद लोकप्रिय थीं। लेकिन उचित संरक्षण, नीति एवं सम्मान के आभाव के चलते इनके कलाकार इस विधा से विमुख हो गये और धीरे-धीरे आज यह शैली मानों दुर्लभ हो चली है। यह मंचन कुछ इस प्रकार से हुआ;

एक करिंगा पूरी जिंदगी अपनी कला से लोगों को सद्बुद्धि की प्रेरणा देते हुए मनोरंजन करता है। पाश्चात्य चाकचिक्य मनोरंजन से लोककला मृत्यु हो गई।

वयोवृद्ध करिंगा का परिवार भूख से बिलबिला उठता है, और अपनी गाय बेचने को विवश हो जाता है। एक ढोंगी साधु और उसके दो पुत्र उसे ठग कर उसकी गाय हड़प लेते हैं। और ₹3 का दाम लगाते हुए तीन तूर में धन देने की बात कहते हैं।खाली हाथ आए करिगा को पत्नी द्वारा धिक्कार पर उसका कलाकार जाग जाता है। और वह  क्रमशः स्त्री व सुनार का रूप धरकर साधु का सारा धन छीन लेता है।

करिंगा की गायकी से एक दरोगा को साधु की तलाश थी। उनकी मित्रता होती है करिंगा का परिवार खुशहाल होता ।है

सरकार कलाकारों को अनेक सुखद लाभ देती है। पत्नी के याद दिलाने पर करिगा वैद्य का रूप धर अपनी कला से साधु को फंसा लेता है। और गाय को प्राप्त कर तीन तूर को पूर्ण करता है। दरोगा साधु और उसके पुत्रों को गिरफ्तार कर लेता है। करिंगा अपनी कला से लोगों का मनोरंजन करने लगता है।

इस प्रस्तुति में मुख्य भूमिका में सीता राम शंकर यादव किशन भोरई आदि ने न्याय किया। हारमोनियम पर ज्ञानेंद्र, ढोलक पर अच्छेलाल, मृदंग पर होरीलाल उत्तम वादन पर मार्गदर्शन किया। शीतला प्रसाद – संगीत, पन्नालाल रूप एवं सब्जा मोहम्मद हामिद – प्रकाश, संचालन – सुजय घोषाल, मंच संचालन – कृष्ण कुमार मोर्य, सहायक निदेशक- शिव सागर शुक्ला, निर्देशन लोक नाट्यविद श्री राजकुमार श्रीवास्तव द्वारा किया गया।

इस बीच समारोह के तहत संस्था विरासत की ओर से लोककलाओं के विकास को लेकर किये गये प्रयासों के लिए लोकविद् अतुल यदुवंशी को ‘राष्ट्रीय लोककला रत्न’ और डॉ. श्लेष गौतम को ‘राष्ट्रीय लोकभाषा सम्मान’ से नवाजा गया।

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