‘दिल्ली मेट्रो’ से भी तेज़ है ‘दिल्ली शहर’ की रफ़्तार, क्यूँकि “ये दिल्ली है मेरे यार!”

  • by Staff@ TSD Network
  • May 28, 2019

24 दिसंबर, 2002 को शहादरा तीस हजारी लाईन से हुई दिल्ली मेट्रो आज मानों शहर की एक ऐसी जरूरत बन गई है, जिसके बिना शायद यह शहर थमे भले ही न, लेकिन इसके बिना शहर को खलेगा बहुत।

दिल वालों का, लेकिन दौड़ता-भागता शहर कहे जाने वाली दिल्ली ने मेट्रो को ऐसे अपनाया है, जैसे मानों ये हमेशा से ही शहर का मुख्य हिस्सा रहा हो। इस मेट्रो की भी किस्मत देखिये, इसको अपनी रफ़्तार पर गुरुर था, लेकिन दिल्ली से वास्ता होने के बाद मानों दिल्ली वालों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की रफ़्तार के आगे इस मेट्रो ने भी घुटने टेक दिए। हालाँकि अब इसने दिल्ली वालों की रफ़्तार के साथ थोड़ा-थोड़ा तालमेल बिठाना जरुर शुरू कर दिया है। लेकिन अब यह अपनी रफ़्तार पर गुरुर नहीं करती।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि इस मेट्रो ने दिल्ली शहर को कुछ नहीं सिखाया। अक्सर ईस्ट, वेस्ट, नार्थ, और सबसे खास साउथ दिल्ली जैसी असामनताओं के साथ बँटे इस शहर को राजीव चौक मेट्रो स्टेशन जैसी जगह बख़ूबी जोड़ती नज़र आने लगीं हैं।

कभी अपनी आरक्षित सीटों के नियमों से, तो कभी जगह न होने के बाद भी सबकों जगह देने वाले अपने संस्कारों के चलते, इस मेट्रो ने दिल्ली वालों में बड़े-बुजर्गों, महिलाओं के साथ ही साथ भीड़ के प्रति भी सम्मान भावना को बढ़ाने का काम किया है।

हालाँकि समाज की तरह ही मेट्रो में भी आरक्षित सीट वाली चीज़ को लेकर लोगों के बीच दो मत सुनने को मिलेंगें। और जहाँ दो मत होते हैं, वहां विवाद भी। और यह एक नॉन पॉलिटिकल आर्टिकल हैं। ऐसे में इसमें विवाद को जगह न ही दी जाए तो अच्छा।

लेकिन अब इस मेट्रो ने वाकई दिल्ली मेट्रो की शक्ल ले ली है, और एक चलती फिरते शहर की तर्ज़ पर दिल्ली के लोगों की चाल से तालमेल बैठाने की कोशिश करती नज़र आती है। इस तालमेल के लिए यह रोज़ कुछ नया सीखती भी है, और पुराना पीछे भी छोड़ती है।

इस मेट्रो का हाल भी दिल्ली की जनसंख्या जैसा हो गया है, जैसे ही लोगों की लगता है कि आने वाले हौज़खास स्टेशन में भीड़ उतर जाएगी, तभी हौज़खास में उतरने वालों को भी अंदर ही ठेलते हुए और भीड़ मेट्रो में सवार हो जाती है। और शहर की ही तरह मेट्रो भी बढ़ी सहजता से भीड़ को स्वीकारते हुए सबको अपने अपने ढ़ंग से जगह बनाने का मौका देती नज़र आती है।

सुबह सुबह वो ऑफिस के नाम पर तैयार होने के चलते, आधी नींद से खुली आँखों से भरी मेट्रो, शहर के एक बड़े वर्ग का नींद के साथ संघर्ष साफ़ दिखाती है।

जी हाँ! वही वर्ग जो अक्सर सुबह-सुबह पैदल या रिक्शा के जरिये सबसे पहले मेट्रो पकड़ने की रेस में मेट्रो स्टेशनों की ओर भागता नज़र आता है। और कुछ तो सड़क में इस असमंजस में भी की मेट्रो स्टेशन के लिए रिक्शा करना है, या कैब या फ़िर पैदल? 😀

और मेट्रो स्टेशन पहुँचने पर भी इस वर्ग की रेस खत्म नहीं होती, इसके बाद भी खुद ही ऊपर जा रहे एस्केलेटर पर यह अधिकांश वर्ग भागता नज़र आता है। मानों एस्केलेटर को शहर और मेट्रो की रफ़्तार की तरह तेज न होने के चलते नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा हो।

और तो और इस वर्ग का संघर्ष यहीं खत्म नहीं होता, यह वर्ग बिना जगह की उपलब्धता देखे मेट्रो में प्रवेश करने की कला में भी पारंगत होता है। और अक्सर मेट्रो के अंदर खड़ा किसी नई मेट्रो लाइन के शुरू होने पर छोटे रास्ते की तलाश करता, मोबाइल में आँखें टिकाये नज़र आ जाता है।

हालाँकि शहर की तरह ही मेट्रो भी भीड़ के बीच तन्हा ही नज़र आती है। लोग अपने अपने कानों को बंद कर लेते हैं, सुनते हैं या नहीं यह तो नहीं पता, लेकिन वह ऐसा दिखाना जरुर चाहते हैं कि उन्हें आपकी बातों से कोई वास्ता नहीं।

लेकिन यह शहर भी कहाँ एक जैसे लोगों से बना है, और भला भी। अक्सर कई ऐसे भी मिल जाते हैं, जो आपस में भी इस कदर बात करते हैं मानों मेट्रो में हो रही अनौंसमेंट से मुक़ाबला करने की कोशिश कर रहें हों।

और जैसे शहर में आने वाला कभी न कभी इंडिया गेट में जरुर नज़र आता है वैसे ही अब वह मेट्रो गेट के बगल भी पीठ टिकाए मोबाइल पर विडियो देखता जरुर पाया जा सकता है।

और शहर की ही तरह इस मेट्रो में भी मजाल है अधिकांश लोग नियमों का सही से पलान कर ले। नियमों से चलें तो भला दिल्ली में रहने का एहसास कैसे हो। और अगर लाख कहने पर कोई मेट्रो स्टेशन में उस पीली लाइन के पीछे खड़ा भी हो जाये, तो वह शहर के गुरुर और मिज़ाज दोनों को ही काफ़ी ठेस पहुंचाएगा।

खैर! भले ही शहर जितना पुराना इतिहास न हो इस मेट्रो का, लेकिन शहर जैसी बात जरुर आ चुकी है। देश की राजधानी की रफ़्तार का मुख्य पहिया बन चुकी इस मेट्रो में बारे में एक ही लेख में सब कुछ बयाँ कर पाना काफी मुश्किल है। अच्छा यह होगा कि आप ही, जी हाँ! दिल्ली वालों आप ही अपने-अपने अनुभव के आधार पर मेट्रो से जुड़ी अपनी कुछ अतरंगी कहनियाँ कमेंट बॉक्स में नीचे हम सभी के साथ साझा करें।

क्यूंकि आपकी भागीदारी के बिना यह लेख भी अधूरा है और दिल्ली मेट्रो भी 😉

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