हिंदी पत्रकारिता के लिए गर्व का दिन: “रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार पर रवीश कुमार ने शब्द!”

  • by Staff@ TSD Network
  • September 9, 2019
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आज बिना संदेह हिंदी पत्रकारिता के लिए गर्व का दिन है। दरसल आज अंततः मनीला (राजधानी, फिलीपींस) में NDTV के मनैजिंग एडिटर रवीश कुमार को रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

जी हाँ! हमेशा की तरह इस समारोह में भी रवीश कुमार का भाषण काफी दिलचस्प रहा। इस पुरस्कार को लेने के बाद रवीश कुमार ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा

“हर जंग जीतने के लिए नहीं लड़ी जाती, कुछ जंग सिर्फ इसलिए लड़ी जाती हैं, ताकि दुनिया को बताया जा सके, कोई है, जो लड़ रहा है”

“जब से रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार की घोषणा हुई है, मेरे आसपास की दुनिया बदल गई है। जब से मनीला आया हूं, आप सभी के सत्कार ने मेरा दिल जीत लिया है। आपका सत्कार आपके सम्मान से भी ऊंचा है। आपने पहले घर बुलाया, मेहमान से परिवार का बनाया और तब आज सम्मान के लिए सब जमा हुए हैं। आमतौर पर पुरस्कार के दिन देने वाले और लेने वाले मिलते हैं, और फिर दोनों कभी नहीं मिलते हैं। आपके यहां ऐसा नहीं है। आपने इस एहसास से भर दिया है। कि ज़रूर कुछ अच्छा किया होगा, तभी आपने चुना है। वर्ना हम सब सामान्य लोग हैं, आपके प्यार ने मुझे पहले से ज्यादा ज़िम्मेदार और विनम्र बना दिया है।”

“दुनिया असमानता को हेल्थ और इकोनॉमिक आधार पर मापती है, मगर वक्त आ गया है कि हम ज्ञान असमानता को भी मापें। आज जब अच्छी शिक्षा खास शहरों तक सिमटकर रह गई है, हम सोच भी नहीं सकते कि कस्बों और गांवों में ज्ञान असमानता के क्या ख़तरनाक नतीजे हो रहे हैं। ज़ाहिर है, उनके लिए व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का प्रोपेगंडा ही ज्ञान का स्रोत है। युवाओं को बेहतर शिक्षा नहीं पाने दी गई है, इसलिए हम उन्हें पूरी तरह दोष नहीं दे सकते। इस संदर्भ में मीडिया के संकट को समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर मीडिया भी व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का काम करने लगे, तब समाज पर कितना बुरा असर पड़ेगा। अच्छी बात है कि भारत के लोग समझने लगे हैं। तभी मुझे आ रही बधाइयों में बधाई के अलावा मीडिया के ‘उद्दंड’ हो जाने पर भी चिंताएं भरी हुई हैं। इसलिए मैं खुद के लिए तो बहुत ख़ुश हूं, लेकिन जिस पेशे की दुनिया से आता हूं, उसकी हालत उदास भी करती है।”

“पत्रकार होना अब व्यक्तिगत प्रयास हो गया है, क्योंकि समाचार संगठन और उनके कॉरपोरेट एक्ज़ीक्यूटिव अब ऐसे पत्रकारों को नौकरियां छोड़ देने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो समझौता नहीं करते। फिर भी यह देखना हौसला देता है कि ऐसे और भी हैं, जो जान और नौकरी की परवाह किए बिना पत्रकारिता कर रहे हैं। फ्रीलांस पत्रकारिता से ही जीवनयापन कर रही कई महिला पत्रकार अपनी आवाज़ उठा रही हैं। जब कश्मीर में इंटरनेट शटडाउन किया गया, पूरा मीडिया सरकार के साथ चला गया, लेकिन कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने सच दिखाने की हिम्मत की, और ट्रोलों की फौज का सामना किया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि संगठनों और उनके नेताओं से कब सवाल किए जाएंगे?”

“क्या हम समाचार रिपोर्टिंग की पवित्रता को बहाल कर सकते हैं। मुझे भरोसा है कि दर्शक रिपोर्टिंग में सच्चाई, अलग-अलग प्लेटफॉर्मों और आवाज़ों की भिन्नता को महत्व देंगे। लोकतंत्र तभी तक फल-फूल सकता है, जब तक ख़बरों में सच्चाई हो। मैं रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार स्वीकार करता हूं. इसलिए कि यह पुरस्कार मुझे नहीं, हिन्दी के तमाम पाठकों और दर्शकों को मिल रहा है, जिनके इलाक़े में ज्ञान असमानता ज्यादा गहरी है, इसके बाद भी उनके भीतर अच्छी सूचना और शिक्षा की भूख काफी गहरी है। बहुत से युवा पत्रकार इसे गंभीरता से देख रहे हैं। वे पत्रकारिता के उस मतलब को बदल देंगे, जो आज हो गया है। मुमकिन है, वे लड़ाई हार जाएं, लेकिन लड़ने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है। हमेशा जीतने के लिए ही नहीं, यह बताने के लिए भी लड़ा जाता है कि कोई था, जो मैदान में उतरा था।”

इस मौके पर रवीश एक बिल्कुल नए लुक में भी नज़र आए। उन्होनें खुद इसका जिक्र करते हुए इस किस्से को कुछ यूँ बयाँ किया:

“कभी बंद गला पहना नही। पहनते ही लगा जैसे किसी ने क़ालीन को मोड़ कर खड़ा कर दिया हो। रहमान कई साल से कह रहे थे कि पहना कीजिए। हम मना कर देते थे। बंद गला में आदमी बंद हो जाता है। पर क्या करें रहमान को मना नहीं कर सके। जब अंग्रेज़ी बोल ही रहे हैं तो कपड़ा भी दूसरे के मन का पहन लेते हैं। कोई अगर ख़ुश होता है तो अच्छी बात है। शुक्रिया रहमान। रहमान हमारे मोतिहारी ज़िले पड़ोसी हैं। उन्होंने ही बंद गले में मुझे बंद किया है। ये उनकी कारीगरी है।”

हालाँकि इस बीच इस पुरस्कार के मद्देनज़र रवीश कुमार को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया में उनका एक विडियो काट कर वायरल किया गया लेकिन जाहिर तौर पर वह पूरा विडियो सामने आने पर ऐसा करने वालों को मुँह की खानी पड़ी।

इस बीच ऐसी घटिया हरकतें करने वालों की चौतरफ़ा आलोचना भी हुई;

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