आख़िर क्यूँ 2014 के बाद बदल सा गया अधिकांश भारतीय मीडिया का स्वरुप? – TSD Report

  • by Staff@ TSD Network
  • August 19, 2019
punya prasun bajpai

जैसा कि हम जानते हैं कि हाल ही में NDTV के वरिष्ठ पत्रकार, रवीश कुमार को ‘रैमॉन मैगसेसे’ अवार्ड से सम्मानित किया गया। हालाँकि इसका अधिकतर श्रेय हमें अन्य मेंन स्ट्रीम मीडिया को भी देना चाहिए। कहीं न कहीं उनकी चाटुकारितावादी पत्रकारिता ने टीवी चैनलों में मूलभूत पत्रकारिता को ही इतना दुर्लभ बना दिया कि सिर्फ़ असल पत्रकारिता करना ही रवीश कुमार को ख़ास बनाता गया।

कई लोगों ने शायद उपरोक्त लाइनों को पढ़ कर ही यह मान लिया होगा कि यह मोदी सरकार के खिलाफ़ है, या फ़िर इससे भी अधिक कि हमें कांग्रेस का समर्थन हासिल हैं और अगर किसी ने हमें देशद्रोही ही घोषित कर दिया हो, तो फ़िर अब ऐसों से क्या ही तर्क करना? लेकिन बाकी दोनों विचारों पर मैं स्पष्टीकरण जरुर दे दूँ। जो कि आजकल जरूरी भी है।

देखिये जहाँ तक मोदी सरकार के विरोधी होने की बात है, तो जरा पूरा पोर्टल देखिये शायद ही सरकार के अच्छे क़दमों की हमसे अधिक तर्कसंगत तरीकें से किसी ने तारीफ की हों। और जहाँ तक रही कांग्रेस से समर्थन वाली बात, तो मुझे इस पर बस इतना कहना है कि वह सिर्फ़ एक विपक्ष की भूमिका भी निभा ले, या चलिए उनके लिए और आसन बना देते हैं, सिर्फ़ अपना एक शीर्ष नेता चुन ले, जो कम से कम संसद पटल पर कुछ तर्कसंगत भाषण ही दे सके, हमारे लिए और देश के लिए यही काफी है, हमें किसी राजनीतिक पार्टी के समर्थन की जरुरत नहीं।

खैर! ट्रेंड के मुताबिक डिस्क्लेमर देने के बाद अब बात करते हैं कि आखिर क्यूँ रवीश कुमार की पत्रकारिता को इतना पसंद किया जाने लगा? दरसल मेरी मानिए तो रवीश कुमार की पत्रकारिता सबसे सरल है। बस उनकी उनकी पत्रकारिता को जो चीज़ खास बनाती है, वह है महज़ ‘पत्रकारिता’। जी हाँ! आप खुद सोचिए सिर्फ़ बुनियादी सवालों से परे उनकी पत्रकारिता में क्या खास हैं? थोड़ी रिसर्च, थोड़ी मेहनत, थोड़ा साहस? यह सब पत्रकारिता का मूल ही तो है? इसमें ऐसा क्या है जो आज कल ये सब दुर्लभ सी हो गईं हैं, और खास सी लगने लगीं हैं?

और हाँ! मैं स्वयं रवीश कुमार को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता, तो मैं दावा भी नहीं करता कि वो व्यक्तिगत रूप से कितने ईमानदार हैं, या निष्पक्ष हैं? बस उनकी पत्रकारिता को देखा है, जिसमें लोकतंत्र की सबसे खुबसूरत चीज़ होती है और वह हैं ‘बुनियादी सवाल’।

शायद बहुत से लोग कहें कि वो तो सिर्फ़ एंटी मोदी हैं, सिर्फ़ मोदी के खिलाफ़ सवाल करते हैं, कांग्रेस का समर्थन हासिल है या जो भी। मैं यहाँ किसी का बचाव करने नहीं बैठा। लेकिन जनाब! विवेक नामक विषयवस्तु का उपयोग करते हुए, कभी आप महज़ समर्थक नहीं, देश के एक नागरिक, एक दर्शक, किसी बेरोजगार, सिस्टम की मार झेल रहे किसी लाचार की नज़र से उस व्यक्ति को छोडिये सिर्फ़ उसकी पत्रकारिता को पढ़िए, देखिये, सुनिए। उस पत्रकारिता को आप कितना पसंद करेंगें मैं वो तो नहीं जानता लेकिन आपने अगर कभी पत्रकारिता का सही अर्थ समझा होगा, तो उसमें आपको सिर्फ़ एक चीज़ नज़र आएगी और वह है ‘पत्रकारिता’। साधारण, मूलभूत सवालों, रिसर्च से भरी एक बुनियादी पत्रकारिता। जो आजकल काफी दुर्लभ है, क्यों है न?

खैर! अब हम एक प्रश्न तलाशने लगे की आखिर यह पत्रकारिता इतनी दुर्लभ हुई क्यों? आख़िर क्या था जिससे कई बड़े टीवी एंकर सरकार से प्रश्न पूछने में डरने लगे?

इस सवाल की तालश में हमें एक विडियो दिखा, पुण्य प्रसून बाजपेयी का। इस विडियो को आप तक पहुँचाने का फ़ैसला इसलिए हमनें किया क्यूंकि इस विडियो में उनकी राय से परे कुछ तथ्य हैं। हमें नहीं पता आप किस प्रकार से पुण्य प्रसून बाजपेयी को देखते हैं? शायद कई लोग उनको भी देशद्रोही कहतें हों? कांग्रेस का एजेंट कहतें हों?

तो ऐसे लोगों के लिए भी मेरे पास एक हल हैं, एक बार आप आँखें बंद करके सुने ताकि कम से कम आपकी इन्द्रियाँ निष्पक्ष रह सकें। और फ़िर भी अगर आपको तथ्यों से परे सिर्फ़ किसी के विचार सुनने को मिल रहें हों आप इसको बंद कर दें। आसान है न?

तो चलिए सुनते हैं आखिर कैसे पैसों के खेल के चलते देश से पत्रकारिता समाप्त की जा रही है? और इसके बाद सोचियेगा जरुर अगर सवाल उठाने वाले पैसों के बदले चुप रहने का विकल्प चुनने लगें, तो देश की हालत क्या होगी?

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