चुनाव 2019: महज़ नकारात्मकता ही नहीं है ‘सोशल मीडिया’ का एकमात्र पहलु?

  • by Staff@ TSD Network
  • May 23, 2019

आज लोकसभा चुनावों के नतीजें लगभग आ ही चुकें हैं। नतीजों पर हम चर्चा नहीं करेंगें। उसके लिए टेलीवीजन से लेकर तमाम प्लेटफ़ॉर्म पर विशेषज्ञ हैं, जो ज्ञान की गंगा बहा रहें हैं।

आइये हम बात करते हैं सोशल मीडिया की। एकतरफ़ा एजेंडा फ़ैलाने, अफ़वाहें फ़ैलाने, फ़ेंक न्यूज़ जैसे टर्म सोशल मीडिया पर  कई सवाल खड़े करते हैं। कई पैमानों पर यह सवाल जायज भी हैं। और हम या कोई भी इन आरोपों को सिरे से खारिच भी नहीं कर सकता।

दरसल यह वास्तविकता भी है, जिसको प्लेटफ़ॉर्म खुद भी स्वीकारते हैं। और शायद इसलिए इन चुनावों के दौरान फेसबुक (Facebook) ने कई ऐसे कदम उठाए, जिन्हें ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा। 2016 के बाद से ही बात अमेरिकी चुनावों की हो या कई बड़े देशों में होने वाले हर बड़े चुनाव की, सोशल मीडिया की भूमिका में एक बड़ा बदलाव आया है।

आज ख़बरों के लिए पारंपरिक मीडिया से परे अब सोशल मीडिया पर नए ‘डिजिटल मीडिया’ का जन्म होने से ऐसी चीज़ों को बढ़ावा मिला है। जिसके सकारात्मक पहलु भी है और नकारात्मक भी। लेकिन हाँ, नकारात्मकता “ज्यादा” हो सकते हैं, लेकिन “सिर्फ़” नहीं।

यकींन मानिए आज तक किसी देश ने ऐसा कोई कानून नहीं लाया है कि आपको सोशल मीडिया पर आपको कोई एक विशेष पेज या श्रेणी को फॉलो करना है। न ही विश्व में ऐसा कानून है कहीं और न ही भारत में।

दरसल साफ़ सी बात है कि सोशल मीडिया को नकारात्मकता का टैग देने से पहले हमें खुद को और आस-पास को भी देखना पड़ेगा। क्यूंकि विचारधारा तो समाज में भी हर तरह की हैं, लेकिन आप समाज को नहीं बल्कि गलत विचारधारा को फॉलो करने वालेक को ही गलत कहते हैं। तो फ़िर सोशल मीडिया को ही बुरा साबित कर देना, कभी इन फ़ेंक न्यूज़ और अफ़वाहों कि समस्या से निज़ात नहीं दिला पायेगा, क्यूंकि समस्या की जड़ सोशल मीडिया है ही नहीं।

हम यहाँ सोशल मीडिया के पक्षकार और वकील की तर्ज़ पर खुद को पेश नहीं करना चाहते। हम सिर्फ़ चाहतें ही की अगर किसी बड़ी समस्या को उठाया जा रहा है, तो उसकी असल जड़ को भी समझा जाए। जरुरी भी है यह, वरना महज़ ऐसे खोखले तौर पर महज़ सारा आरोप किसी प्लेटफ़ॉर्म पर लगाना उचित थोड़ी है।

खैर! चुनाव के बाद आज रिजल्ट का माहौल है, और ऐसे में हम इस लोकतंत्र के पर्व पर आज जश्न के दिन हम बिना किसी का मजा किरकरा किये, अपनी बात यही कहते हुए खत्म करते हैं कि सोशल मीडिया भी महज़ एक प्लेटफ़ॉर्म है, इस पर अपनी फ़ीड चुनना आपके विवेक पर है।

लोकतंत्र के जश्न का दिन है, और ऐसे में जरूरी है कि इस पर्व को रोशन करने वाली चीज़ यानि “मतदान” को लेकर इस बार सोशल मीडिया की सकारात्मक भूमिका भी आपके सामने प्रस्तुत की जाए।

सिर्फ़ अफवाहें और प्रोपेगेंडा फ़ैलाने के आरोपों से जूझ रही यही सोशल मीडिया कैसे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में योगदान कर रही है, यह भी देखना चाहिए। जरूरी यह है कि हर पहलु आपके सामने रखा जाए, सिर्फ़ एक आँख से किसी को देखकर क्यों तौलना जब आप दूसरी आँख से भी देख सकतें हैं?

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