सरकारी संस्थाओं और समाज दोनों की अनदेखी से बिखरता ‘रंगमच’

  • by Staff@ TSD Network
  • September 18, 2019
रंगमंच

कहतें हैं कला और साहित्य एक ऐसा जरिया है, जो कई बार समाज को ही आईना दिखा कर उसे झकझोर कर रख देता है। जरुरी भी है क्यूंकि कोई भी व्यक्ति या समाज हमेशा सही नहीं हो सकता, उसको उसकी गलतियों पर आईना दिखा कर शर्मिदा करने की भी जरूरत होती है।

शायद कुछ को लगे की किसी को शर्मिंदा करना अच्छा कैसे हो सकता है? लेकिन मैं बता दूँ कि संसार में शायद शर्मिंदगी ही ऐसा जरिया है जो सुधार के प्रयासों में ईमानदारी लाता है।

खैर! दुःख का विषय तो यह है कि इस प्रक्रिया को संजोने वाली एक कला ही अब संकट में है। और यकींन मानिए उसकी ओर कोई जवाबदेह व्यक्ति ध्यान देता भी नज़र नहीं आ रहा। मैं बात कर रहा हूँ रंगमंच की। जी हाँ! वहीँ रंगमंच जो हर दौर में अपने लिए एक सम्मान का स्थान खोज ही लेता है, और ऐसा इसलिए क्यूंकि उसको अपनी जिम्मेदारी का पता होता है।

वही रंगमंच जिसने खुद बुनियाद बनकर न जाने कितने नए आयामों को जन्म दिया और शायद कहा जाए की बॉलीवुड जैसे आयामों की स्थापना में भी इसका अभूतपूर्व योगदान रहा है और रहेगा भी, तो यह कहीं से ग़लत नहीं होगा।

बतौर पत्रकार मेरा सौभाग्य रहा है कि मैं कई रंगमंच संस्थानों और कलाकारों से जुड़ा रहा और आज भी जुड़ा हूँ, और मैंने देखा है उन कलाकारों को जिन्हें रंगमंच कुछ ऐसा बना देता है, जिससे वह सामाजिक विषय पर व्यापक रूप से सोच सकें, एक आम आदमी से परे कई सामाजिक विषयों पर मैंने इन कलाकारों की सोच को हमेशा दिलचस्प पाया है। उनकी सोच से अक्सर कुछ न कुछ सकारात्मक सीखने को भी मिला है।

और जब रंगमंच इन कलाकारों को ऐसा बना देता है तो कलाकार भी इसी रंगमंच से आम जनमानस तक सामाजिक विषयों पर अपनी सोच कुछ इस अंदाज़ में पहुँचाते हैं कि लोग भी सोचने को मजबूर हो जाएँ और अपनी बंद आँखों को खोल उन पहलूओं को भी देखें जिसको वो हमेशा से नज़रंदाज़ करते आए हैं।

लेकिन चलिए मैं आपसे एक प्रश्न करता हूँ और आप मुझे उसका उत्तर देने की बजाए खुद को ही जवाब देने की कोशिश कीजियेगा। आपने कितनी बार रंगमंच कर्मियों को व्यापक मंच या सड़कों इत्यादि पर नुक्कड़ नाट्य जैसी प्रस्तुति देते देखा है? शायद 2 बार या हो सकता है 1 बार या शायद कभी नहीं? है न?

बहुत से लोग कहेंगें की हमारे पास समय नहीं है, या हमें पता नहीं चलता कि कब कोई प्रस्तुति होने वाली है या फ़िर हमारे इलाक़े में ऐसा कुछ होता ही नहीं।

बाकी दो कारणों का तो मैं कुछ नहीं कर सकता लेकिन हाँ अंतिम कारण के बारे में मैं जरुर बात करना चाहूँगा। दरसल यह सच है, नुक्कड़ नाटकों, मास्क शों, पपेट शो या कहीं न कहीं व्यापक रंगमंच भी समाज में तेजी से गायब होता या सिमटा नज़र आ रहा है। और इस बात से शायद ही आप या कोई भी इंकार करे।

लेकिन यह होना ही था क्यूंकि रंगमंच को सभी ने बराबर और निरंतर ही नज़रंदाज़ किया है, फ़िर चाहे वह सरकारी संस्थानें हों, व्यवसायी समाज या फ़िर खुद दर्शक?

हम सभी ने चीज़ों को बेचने के मकसद से काफी अलंकृत करके बनायीं जाने वाली फिल्मों इत्यादि को तो खूब प्रोत्साहन दिया है, लेकिन समाज की दशा को ‘ज्यों का त्यों’ पेश कर, उसके सुधार के लिए प्रेरित करने वाले रंगमंच/नुक्कड़ नाट्य जैसी कलाओं की बराबर अनदेखी की है।

उत्तर भारत में कभी चरम पर रही इस कला को अब मानों खुद के प्रसार के बजाए खुद को संजोने के प्रयास करने पड़ रहें हैं। संसाधनों के आभाव ने मानों इस कला की विरासत को कलाकारों से छिनना सा शुरू कर दिया है।

अभी हाल ही में एक पोस्ट द्वारा कानपुर के कलाकारों का दर्द भी झलका। इस पोस्ट में रंगमंच कर्मियों द्वारा हॉल इत्यादि की अव्यवस्था झेलने का दर्द साफ़ नज़र आता है, यह पोस्ट कुछ यूँ तकलीफें बयाँ करता है;

“कल शाम कानपुर के एक रंग कर्मी की पीढ़ा फिर छलक पड़ी। यूं तो नाटक के कामयाब प्रदर्शन के बाद जो व्यक्ति सबसे अधिक प्रसन्न होता है, वो होता है उस नाटक का निर्देशक। लेकिन कल निर्देशक रतन राठौर एक सफल मंचन के बाद भी क्रोधित थे, दुखी थे। कारण वहीं मर्चेंट चैंबर हाल की अव्यवस्था। जहां पड़ोस के लखनऊ और प्रयागराज ऐसे शहरों में लाइट और साउंड से सुसज्जित हाल ६ से दस हज़ार के बीच मिल जाते हैं, जबकि कानपुर में अकेला हाल ही २५०००/ रुपए में मिलता है, वो भी केवल कुछ घंटों के लिए। इतने कम समय में आपको लाइट, सेट आदि सब लगवाना है। ऐसे में जब जब रंगशाला का फ्यूज बार बार उड़ कर कलाकारों का तारतम्य और दर्शकों की एकाग्रता भंग करे तो ऐसी व्यवस्था पर कोफ्त होता है। मर्चेंट चैंबर हाल की व्यवस्था अब ऐसे निकृष्ट लोगो के हाथों में चली गई है जो किसी भी चीज के लिए अपनी कोई जवाबदारी नहीं समझते।”

आपमें से बहुत से लोग कहेंगें कि तो क्या मैं रंगमचकर्मियों के लिए इस पोस्ट के माध्यम से मुफ़्त मंचों की माँग करने के प्रयास कर रहा हूँ? तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि मेरा प्रयास सिर्फ़ और सिर्फ़ रंगमंच की स्थिति को ठीक वैसे ही ‘ज्यों का त्यों’ आप तक पहुँचाने का है।

बाकी जहाँ तक बात रही मुफ़्त में हॉल/ऑडिटोरियम मुहैया करवाए जाने की तो यह असंभव तो नज़र नहीं आता, कुछ बुनियादी शर्तों के साथ मुज्जफ़रनगर में ऐसा किया भी गया है।

लेकिन चलिए मुफ़्त न सही पर इस बहुमूल्य कला को संजोने के लिए कम से कम ज़िम्मेदार संस्थाएं उचित मूल्य लेकर उसके एवज में व्यवस्थित सुविधाएं तो मुहैया करवा ही सकती हैं? इतना मुश्किल है क्या? मुझे नहीं लगता!  समाज के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली यह कला अपनों से इतनी अपेक्षा का तो हक़ रखती ही है?

दरसल इस मुद्दे को प्रयागराज स्थित नुक्कड़ नाट्य अभिनय संस्थान भी समय समय पर उठाता रहा है। और यकीन मानिए मैंने देखा है इस और इस जैसे कई संस्थानों का समाज के प्रति योगदान। उदाहरण के लिए ऐसे वक़्त जब आज सभी जानते हैं कि पेय योग्य जल की राज्य, देश में ही नहीं दुनिया भर में तेजी से कमी बढ़ रही है, या कहिए तो अकाल जैसी स्थिति भी आ ही चुकी है, चेन्नई जैसे शहर हाल में इसके गवाह भी बने। लेकिन इन सब के बावजूद जब इस विषय पर कोई बात तक करने को तैयार नहीं है, तब नुक्कड़ नाट्य अभिनय संस्थान कुछ अन्य सहयोगी संस्थानों के साथ शहर भर में लगभग रोज़ मास्क शो जैसी अद्भुत कला के जरिये लोगों को जल संरक्षण का प्रण करवा रहा है और साथ ही उन्हें आने वाली भयावह स्थिति की भी जानकारी दे रहा है।

लेकिन भला हम ऐसे संस्थानों के लिए क्या कर रहें हैं? मुझे नहीं लगता कि कोई भी, न ही ज़िम्मेदार संस्थाएं और न ही दर्शक ऐसी कलाकारों और कला के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। आप सिर्फ़ इस पोस्ट को पढ़ या कभी कुछ और देख जरुर दो पल के लिए सजग हो जाएँ, लेकिन क्या वाकई इस अद्भुत कला को निरतंर खोते चले जाने का डर आपमें भी उतना ही है, जिनता इन कलाकारों में?

बतौर मीडिया पार्टनर हमारी टीम ने नुक्कड़ नाट्य अभिनय संस्थान के सचिव और निर्देशक, कृष्ण कुमार मौर्य और उनकी पूरी टीम की मेहनत को महसूस किया है।

इस और इसके जैसी तमाम संस्थानों की मेहनत देखकर लगता है कि हाँ! शायद अभी भी वह रंगमंच जिंदा है, जिसकी प्रस्तुतियां देख लौटते वक़्त हर बार हम थोड़ा और बेहतर बन जाते हैं।

लेकिन जब ऐसे पोस्ट के जरिये मैं इन कलाकारों का दर्द छलकता देखता हूँ, तो डर लगता है कि आने वाली पीढ़ी, समाज के लिए बनाये गये इस अद्भुत और कीमती आईने को खो न दे!

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